रविवार, 27 जुलाई 2008

मेरा क्या क़सूर? हाल ऐ दिल!

फिर वही चीख़ पुकार,
फिर वही रोते बिलखते बच्चे,
फिर उन ज़ख्मों पर नमक छिड़कते लोग,
फिर वही लाशों का ढेर और उस पर बैठे ठेकेदार,
फिर वही बेबस सी नज़रें किसीका इन्तेज़ार करती हुई,
फिर से ख़ुद को ठगा सा महसूस करते माँ- बाप,
फिर वही नफरत की नज़र से मेरी तरफ़ देखते लोग

ये वो तोहफा है जो मुझे, अपना भाई कहने वालों ने फिर से दिया है।
नफरत, ढेर सी नफरत बिना कुछ किए हुए। मेरा क्या क़सूर?

4 टिप्‍पणियां:

  1. सच है बेकसूर ही मारे जाते हैं और हमारी सरकारें.... सब जानते हैं कहनें की जरूरत ही नही।

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  2. सच है बेकसूर ही मारे जाते हैं और हमारी सरकारें.... सब जानते हैं कहनें की जरूरत ही नही।

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  3. आज भारत ही नहीं पूरा विश्‍व आतंकवाद की चपेट में आ चुका है। इस तरह का घिनौना काम करने वाले इंसान कहलाने के लायक भी नहीं हैं। शर्म आती है जिस तरह से भारत में आतंकवादी हमलों में तेज़ी आई है और सुरक्षा तंत्र इसे रोक पाने में असमर्थ रहा है। दोष तो व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार का है। वैसे रही-सही कसर नेतागिरी पूरा कर देती है जो ऐसी घटनाओं का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करते हैं।

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  4. ऐसे लोग किसी के भाई नहीं हो सकते। न आपके न मेरे।
    घुघूती बासूती

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