सोमवार, 24 मई 2010

बस स्टॉप और तेरी यादों से रिश्ता! हाल ऐ दिल!


कल कोई ज़िक्र वफ़ा का कर रहा था कहीं...और मैं फिर आदतन तुम्हे याद कर बैठा........ क्या करूँ पागलपन गया जो नहीं है अभी........फिर उस शख्स की बातें ध्यान से सुनने लगा और ..........और..........और फिर सोचा अब भी लोग वफ़ा पे यकीन करते हैं?........यूँही शिक़वे शिक़ायत करते आगे बढ़ा...........तो ख़ुद को उसी बस स्टॉप पर पाया, जहाँ अक्सर मैं तुम्हारा इंतज़ार किया करता था.............कुछ देर वहां रुका और अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गया.........चलते चलते यूँही एक पुराना तराना दिमाग में आया .........फिर वही यादों का दौर एक बार फिर, शुरू जो हुआ दिन ढलने के बाद तक जारी रहा....

सर--शाम तेरी याद......
और
नम आँखें...
तेरी
यादों से कुछ रिश्ता बाक़ी है अभी......

रविवार, 16 मई 2010

अगर ये फासला ना होता, तो क्या ये मज़ा होता ? त्रिवेणी की कोशिश!


याद जब भी आती है, तो आँखें नाम हो ही जाती हैं,
तेरी बातों की यादों में, ये ग़ोते लगाती हैं ,
!
!
!
अगर ये फासला ना होता, तो क्या ये मज़ा होता ?

सोमवार, 10 मई 2010

जाने से पहले ख़ता तो बता जाता। हाल ऐ दिल!


उसके जाने का हमें अफ़सोस तो बहुत था,
मगर उससे भी ज़्यादा अफ़सोस उसकी बेरुख़ी था,
उसको जाना था, तो चला जाता, हम ना रोकते उसे,
मगर जाने से पहले ख़ता तो बता जाता।

गुरुवार, 6 मई 2010

शनिवार, 1 मई 2010

और वो मुझे ग़म देता रहा! हाल ऐ दिल!


वो मुझे ग़ैर समझता रहा उम्र भर,
और मैं उसे अपना कहता रहा ,
वो मुझसे दूर रहा करता था हर दम,
और मैं अपनी ज़िन्दगी में उसे रखता रहा,


था एक नादान मैं ही,


मैं उसके ग़म में रोता रहा,
और वो मुझे ग़म देता रहा...

Pic from:http://www.fineartprintsondemand.com/

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