रविवार, 18 जुलाई 2010

सोमवार, 24 मई 2010

बस स्टॉप और तेरी यादों से रिश्ता! हाल ऐ दिल!


कल कोई ज़िक्र वफ़ा का कर रहा था कहीं...और मैं फिर आदतन तुम्हे याद कर बैठा........ क्या करूँ पागलपन गया जो नहीं है अभी........फिर उस शख्स की बातें ध्यान से सुनने लगा और ..........और..........और फिर सोचा अब भी लोग वफ़ा पे यकीन करते हैं?........यूँही शिक़वे शिक़ायत करते आगे बढ़ा...........तो ख़ुद को उसी बस स्टॉप पर पाया, जहाँ अक्सर मैं तुम्हारा इंतज़ार किया करता था.............कुछ देर वहां रुका और अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गया.........चलते चलते यूँही एक पुराना तराना दिमाग में आया .........फिर वही यादों का दौर एक बार फिर, शुरू जो हुआ दिन ढलने के बाद तक जारी रहा....

सर--शाम तेरी याद......
और
नम आँखें...
तेरी
यादों से कुछ रिश्ता बाक़ी है अभी......

रविवार, 16 मई 2010

अगर ये फासला ना होता, तो क्या ये मज़ा होता ? त्रिवेणी की कोशिश!


याद जब भी आती है, तो आँखें नाम हो ही जाती हैं,
तेरी बातों की यादों में, ये ग़ोते लगाती हैं ,
!
!
!
अगर ये फासला ना होता, तो क्या ये मज़ा होता ?

सोमवार, 10 मई 2010

जाने से पहले ख़ता तो बता जाता। हाल ऐ दिल!


उसके जाने का हमें अफ़सोस तो बहुत था,
मगर उससे भी ज़्यादा अफ़सोस उसकी बेरुख़ी था,
उसको जाना था, तो चला जाता, हम ना रोकते उसे,
मगर जाने से पहले ख़ता तो बता जाता।

गुरुवार, 6 मई 2010

शनिवार, 1 मई 2010

और वो मुझे ग़म देता रहा! हाल ऐ दिल!


वो मुझे ग़ैर समझता रहा उम्र भर,
और मैं उसे अपना कहता रहा ,
वो मुझसे दूर रहा करता था हर दम,
और मैं अपनी ज़िन्दगी में उसे रखता रहा,


था एक नादान मैं ही,


मैं उसके ग़म में रोता रहा,
और वो मुझे ग़म देता रहा...

Pic from:http://www.fineartprintsondemand.com/

रविवार, 25 अप्रैल 2010

"कुछ ख्वाब कभी सच नहीं हुआ करते।'' हाल ऐ दिल!

मैं आज फिर,
रोज़ की तरह सो कर उठा,
तुम्हें ढूंढा कुछ देर,
बिस्तर पर हाथ मारते हुए,
फिर याद आया,
"कुछ ख़्वाब कभी सच नहीं हुआ करते।''

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

रविवार, 31 जनवरी 2010

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

बुधवार, 27 जनवरी 2010

रविवार, 24 जनवरी 2010

SVM education centre और मैं.


तीन माह से अधिक हो गया है एक N G O में पढ़ते हुए। सोचा था कम रो वैसे भी रहा हूँ, कुछ जन सेवाकर भी कमाकर देखते हैं।

आज से ३ महीना पहले जब मुझसे स्कूल के प्रिंसिपल ने मिल्कात की थी तो कहा तो यही था के यहाँ आपको जन सेवा करने क मौका मिलेगा, जगन आपको हम उतनी सलारी तो नहीं दे पाएंगे जितनी आप पढ़कर फीस लेते हैं मगर कुछ तो ज़रूर देंगे। मिअने भी सोचा लीड इंडिया वालों ने तो बुलाया नहीं चलो यहीं चलकर कुछ दिल बहला लेते हैं।

पहले ही दिन दोपहर के दो बजे के बाद ( जैसा सबको पता है, वक़्त पर पहुंचना मेरे बसकी बात नहीं है) मैंने सेण्टर में क़दम रखा और पहले ही पल मुझे महसूस हुआ के मैं कहाँ आ गया हूँ। मेरे सामने ३ कुर्सियां एक मेरे लिए और दो अन्य छात्रों के लिए और बाकि बच्चों के लिए, दरी। ये बात मुझे अन्दर जाते ही चुभ गयी। ऊपर से मेरे लिए कुर्सी, ये कोई मजाक सा था, क्यूंकि मुझे बैठकर पढ़ने की आदत ही नहीं है। पहले दिन तो जैसे तैसे इसी तरह पढाया मगर अगले ही दिन से मैंने अपनी कुर्सी कमरे से बाहर निकलवा दी, इसी शर्म में बाकी दोनों बच्चों ने भी अपनी अपनी कुर्सियों क त्याग कर दिया। अब हम सभी दरी पर बैठे हैं। जब मेरे बैठे क मन होता है, या कुछ किसी एक या दो बच्चों को समझाना होता है।

जब पढ़ने शुरू किया था, तब केवल १९ नाम ही थे register में ११ या १२ छात्र मौजूद थे कमरे में। लगा मुफ्त में लोगों को शिक्षा पसंद नहीं आती, या शायद शिक्षा मिलती ही ना हो। आज क्लास देखता हूँ तो दिल खुश हो जाता है, २९ बच्चे register और क्लास में।

ये झूठ इतना खूबसूरत क्यूँ होता है? त्रिवेणी की कोशिश!

यूँ बरसते हैं उसकी आँखों से आंसू,
जैसे सीप से मोती निकलकर बिखर रहे हों,
!
!
!
ये झूठ इतना खूबसूरत क्यूँ होता है?

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