मैं आज फिर,रोज़ की तरह सो कर उठा,
तुम्हें ढूंढा कुछ देर,
बिस्तर पर हाथ मारते हुए,
फिर याद आया,
"कुछ ख़्वाब कभी सच नहीं हुआ करते।''
कोतुहल मेरे दिमाग में उठता हुआ एक छोटा सा तूफ़ान है.जिसमें में अपने दिल में उठा रही बातों को लिख छोड़ता हूँ.और जैसा की नाम से पता चलता है कोतुहल.
मैं आज फिर,
गज़ब की प्रस्तुति।
ReplyDeleteहर शब्द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति ।
ReplyDeleteक्या बात है..बहुत खूब!
ReplyDeleteखूब उतारा है ख़्वाबों को....पुरे हो जाएँ तो हकीकत बन जायेंगे ना..
ReplyDeleteवाह .. निःशब्द आपकी छोटी से रचना पर .. बहुत लंबी बात कह गयी ...
ReplyDeleteज़र्रा नवाज़िश क शुक्रिया।
ReplyDelete