मंगलवार, 28 सितंबर 2010

शायद अब क़द्र उसको यारों की होगी! त्रिवेणी की कोशिश!

है उदास वो आज फिर,
बैठा है तन्हा,
!
!
!
शायद अब क़द्र उसको यारों की होगी...

1 टिप्पणी:

  1. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है .

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