मंगलवार, 15 जुलाई 2008

के वो गैर हैं, तो कहते नही। हाल ऐ दिल!

हमें है मुहब्बत उससे मगर,
वो अब गैर है, तो कहते नही।

यूँही समझा लेते हैं दिल को अब,
के वो गैर हैं, तो कहते नही।

चलती है जब कभी ये हवा,
उनके घर की तरफ़ से यूँ,
झुका लेते हैं हम अपना सर,
के वो गैर हैं, कहते नही।

करता है दिल उन्हें देखने की ज़िद,
ख्वाबों में दीदार उनका कर लेते है हम,
नही देखते अब उनकी गली,
के वो गैर हैं, कहते नही।

न सोचा था के आयेगा ये भी वक्त,
बैठेंगे जब उनसे दूर हम,
पत्थर है ये दिल पे रखा,
के वो गैर हैं, कहते नही।

कल रात जब उस ख्वाब में,
माँगा था तुमने कान्धा मेरा,
हमने न ली कोई भी करवट,
के वो गैर हैं कहते नही।

5 टिप्‍पणियां:

  1. कल रात जब उस ख्वाब में,
    माँगा था तुमने कान्धा मेरा,
    हमने न ली कोई भी करवट,
    के वो गैर हैं कहते नही।

    bahut badhiya......

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  2. कल रात जब उस ख्वाब में,
    माँगा था तुमने कान्धा मेरा,
    हमने न ली कोई भी करवट,
    के वो गैर हैं कहते नही।

    बहुत बेहतरीन ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. न सोचा था के आयेगा ये भी वक्त,
    बैठेंगे जब उनसे दूर हम,
    पत्थर है ये दिल पे रखा,
    के वो गैर हैं, कहते नही।
    KYA BAT HAI HAI BAHUT BEHATAREEN.

    उत्तर देंहटाएं

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