गुरुवार, 24 जुलाई 2008

ज़िन्दगी.....

तमाशबिनो सी हो गई है ज़िन्दगी॥
बीच रस्ते में कहीं खो गई है ज़िन्दगी॥
कोई रास्ता कोई मकसद दिखाई देता है॥
खानाबदोशों सी हो गई है ज़िन्दगी॥


सहरो की मोहताज बनी है ज़िन्दगी॥
अपनों का ही शिकार बनी है ज़िन्दगी॥
कोई अपना सहारा दिखाई देता है॥
बंजर सी हो गई है ज़िन्दगी॥


खौफनाक खवाब सी लगती है ज़िन्दगी॥
अँधेरी रात सी अब डसती है ज़िन्दगी॥
कोई उम्मीद रौशनी दिखाई देती है॥
रोते रोते अब तो सो गई है ज़िन्दगी॥


फूलों की चादर सी चाही थी ज़िन्दगी॥
काँटों की सेज सी पाई है ज़िन्दगी॥
कोई महक मरहम दिखाई देता है॥
एक कशमकश सी हो गई है ज़िन्दगी॥


दर दर भटकती है ज़िन्दगी॥
बस गमो को ही जगह देती है ज़िन्दगी॥
कोई खुशी मंजिल दिखाई देती है॥
बिल्कुल गैर ज़रूरी सी हो गई है जिन्गदी..

3 टिप्‍पणियां:

  1. फूलों की चादर सी चाही थी ज़िन्दगी॥
    काँटों की सेज सी पाई है ज़िन्दगी॥
    न कोई महक न मरहम दिखाई देता है॥
    एक कशमकश सी हो गई है ज़िन्दगी॥

    वाह बहुत अच्‍छी रचना बधाई हो काबिलेतारीफ

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर रचना है।अपने नजरिए को बखूबी बयां किया है-

    तमाशबिनो सी हो गई है ज़िन्दगी॥
    बीच रस्ते में कहीं खो गई है ज़िन्दगी॥
    न कोई रास्ता न कोई मकसद दिखाई देता है॥
    खानाबदोशों सी हो गई है ज़िन्दगी॥

    उत्तर देंहटाएं

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