रविवार, 30 मार्च 2008

तेरी तस्वीर : कुछ मेरी डायेरी से!

तेरी तस्वीर को सीने से लगाकर रखा,
तू पास नही था मगर पास बिठाकर रखा।

न भरोसा था के तू है मेरे आस पास कहीं
मगर तेरे होने के एहसास को बनाकर रखा।

हर एक शय में नज़र आ रहा था तू मुझे
कहीं ऐसा तो नही के मैंने तुझे ख्वाब में देखा।

सितम कर ले मुझ पर तू कितना भी सनम,
तुने बस देखा है मुझे , अभी न मेरी बर्दाश्त को देखा।

ख़बर आई थी कुछ देर पहले के तू चला गया है दुनिया से,
मेरे बिन चला जाएगा तू कहीं , ये तो है दुनिया का धोखा।

6 टिप्‍पणियां:

  1. नदीम भाई कया शेर कहे हे भाई , सच मे दिल मोह लिया आप ने,धन्यवाद

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  2. तेरी तस्वीर को सीने मे छुपाये रख्खा है क्या कहने धन्यवाद

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  3. सितम कर ले मुझ पर तू कितना भी सनम,
    तुने बस देखा है मुझे , अभी न मेरी बर्दाश्त को देखा।

    बहुत खूब---

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. ग़ज़ल रिवायत का अनुशासन और बहर (मीटर) का क़ायदा गुम है आपकी इस ग़ज़ल में नदीम भाई.बुरा न माने लिखने के लिये सिर्फ़ ख़याल नहीं काव्य का व्याकरण निभाना भी ज़रूरी है. उर्दू वाले तो इस मुआमले में बहुत सतर्क रहते हैं...किसी को अपनी ग़ज़ल दिखा सकें / जँचवा सकें ऐसा कोई इन्तज़ाम कीजिये न क़िबला !(इसे उर्दू शायरी रिवायत/परम्परा में इसलाह करवाना कहते हैं)

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