सोमवार, 17 मार्च 2008

होता कोई और तो ज़बान खींच लेता पर क्या करूं मेरे देश को मेरे देश न बुरा कहा.

होता कोई और तो ज़बान खींच लेता मैं
पर क्या करूं मेरे देश को मेरे देश न बुरा कहा।

होता किसी और का खंजर तो देता पलट कर वार,
पर क्या करूं के ये खंजर मेरे दोस्तों का था।

आप भी सोचेंगे के ये देश भक्ति की शायरी की अचानक मुझे क्या सूझ गई पर क्या करूं? रोज़ देखता हूँ लोगों को अपने ही देश की बुराई करते हुए। अब उन लोगों को कहें भी तो क्या और कितनों को मना करें। जिसे देखो वो यही कहता है की भारत में ये है और वो नही है। क्या सभी अच्छी चीज़ें विदेशों में ही बस्ती हैं हमारे देश में कुछ नही होता क्या? अगर देश इतना ही बुरा है तो इसे छोड़ क्यों नही देते? गलियाँ भी इसी को देनी हैं और रहना भी इसी में है। अगर कहीं ज़रा से गंदगी नज़र आ हाय तो एक ही बात ये भारत है अगर योरोप होता तो ऐसा नही होता । कोई उनसे पूछे कि अगर इतना ही बुरा लगता है तो ख़ुद साफ क्यों नही कर देते और जितना लोग योरोप जैसे देशों में टैक्स जमा करते हैं क्या हम लोग इतना टैक्स देते हैं?
अगर कहीं करप्शन दिख जाए तो ये करप्शन केवल भारत में ही है और कहीं नही अरे भाई अगर है तो क्यों इसके भागीदार बनते हो? कौन कहता है कि अपनी गाड़ियों में काग़ज़ पोर मत रखो और पुलिस को रिश्वत दो?

मतलब करना भी है और मानना भी नही।
ये तो चंद ही बातें हैं ज़रा हम सब अपने गिरेबान में झाँक कर देख तो लें कि इस देश न हमें क्या क्या दिया है और हम इसकी क़द्र क्यूं नही है करते?

2 टिप्‍पणियां:

  1. बात तो सही है।विचारणीय विषय है।

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  2. जी तो बहुत चाहता है इस घटिया और बरबाद देश को छोड़ कर चले जाने का.................. पर क्या करें कोई सभ्य देश हम जाहिल हिनुस्तानियों को घुसने भी नहीं देगा (उसके देश में भी हम अपनी सारी बुराइयाँ और विकृतियाँ फैला देंगे)

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