शुक्रवार, 28 मार्च 2008

मेरे महबूब की आंखें के रात शबनम सी!

मेरे महबूब की आंखें के रात शबनम सी,
के जिनमें डूबना चाहेगा हर शे ख़ुद ही।

जिधर जाओ नज़र वही बस आए अब,
ये उसकी खूबी है या ये है हद मेरे पागलपन की।

ग़ज़ब हो जाता है मौसम जहाँ से भी वो गुज़र जाए,
अजी ये हाल जब मौसम का है तो क्या होगा इस दिल का भी।

मुबारक हो मेरे महबूब को सारी खुशियाँ अब,
के हम तो गैर हो गए, देखे उसे अब कोई भी।

मेरी मोहब्बत का फ़साना फ़क़त इतना ही हो गया,
के मौसम था तो बहार थी अब मौसम नही तो निकलता नही एक काँटा भी।

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