मंगलवार, 19 फ़रवरी 2008

यूं कभी शाम हो, उस दिन जब किसी को दर्द न मिले.

हम हमेशा सोचते हैं कि हमारा दर्द ही सबसे बड़ा है. पर क्या ऐसा वाकई है?
पता नहीं हमेशा जब भी किसी से मिलता हूँ उस दिन किसी न किसी को कोई न कोई दर्द ज़रूर मिला हुआ होता है. कभी – कभी सोचता हूँ के दर्द होता क्यूँ है? फिर अचानक कुछ धार्मिक बातें याद आ जाती हैं कि खुदा अपने बन्दों का वक़्त – वक़्त पे इम्तिहान लेता है.पर क्या वाकई खुदा को इम्तिहान लेने की ज़रूरत है? पता नहीं?
फिर ज़रा T.V. का रिमोट उठाता हूँ और ख़बर पे लगा लेता हूँ.वहाँ भी कोई न कोई दर्द की ही बात. किसी को राजनीती का दर्द, तो किसी के घर का दर्द.मन बहलाने के लिए किसी नाटक पे लगाना तो ग़ज़ब हो जाता है, हमारे चैनल्स अधिक्तर कोई दर्द वाले ही. नाटक दिखा रहे होते हैं.अब क्या करें कहाँ जाएँ. हाँ एक गाना ज़रूर याद आता है कि…हम को भी ग़म न मारा, तुम को भी ग़म ने मारा, इस गम को मार डालो.
लेकिन शायद ये गम बड़ा मज़बूत है?
ये बात लिखते वक्त अचानक मन में ख्याल आया की मैं क्यूँ मायूसी की बात लिख रहा हूँ.पर फिर सोचा जो दिल में चल रहा है उसे कोतुहल पर न उतारून तो मन हल्का कैसे होगा सो उतारने बैठ गया.

यूँ कभी शाम हो, उस दिन जब किसी को दर्द न मिले
ख्याल यूँ आये के हर ख्याल में ख़ुशी की खुशबू महके

तड़प उठे हर वो शख्स,
जिस के दिल में किसी के लिए बुरा ख्याल गुज़रे

मुक़द्दर तो दे दिया ए रब तूने मेरा भी,
पर कैसे लोग थे जो इस ज़िन्दगी को जीकर निकले

तमाम रात सोचता रहा मैं ये
कहीं ऐसा न हो मेरी ज़िन्दगी भी ग़मों से होकर गुज़रे

मैं इन्तेज़ार में हूँ उस शाम के मेरे मौला
जिसके दिन में किसी गम की कोई खबर न गुज़रे

1 टिप्पणी:

  1. aapki nazm behatareen hai, khas taur par dusari line ki,tadap uthe har woh shakhs,jiske dil mein kisi ke liye bura khyal guzare......amazing thought baki ka hissa padhkar aisa lagta hai jaise aap apne hisse sirf khushiyan chahte hain, mera manna hai ki gam ALLAH ki bakhshi azeem naimat hai aur gamon se inkar karna uski naimaton se inkar karne jaisa hai......
    hum aapko bar-bar padhna chahenge........
    likhte rahiye isi tarah, lekin gamon ka shukr ADA karte huye......

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