गुरुवार, 19 जून 2008

कैसे कहें किस्मत साथ नही देती: एक ग़ज़ल!

तो जनाब कल जैसे हमने फ़रमाया था। निदा अर्शी के बारे में उन्होंने अपनी एक और रचना भेजी है। उम्मीद है आपको पसंद आयेगी। और हाँ अब हमने उनसे ये वादा भी ले लिए है कि वो अब बराबर लिखती रहेंगी। उम्मीद है आगे भी उन्हें पढने का मौका मिलेगा।
पेश-ऐ-खिदमत है, निदा अर्शी की एक और रचना।

काफिले तो कई मिले ज़िन्दगी के सफ़र में,
पर हमने सब से किनारा कर लिया।


गुमनामी में जीने की ख्वाहिश जगी,
और हमने अंधेरो में बसेरा कर लिया।


बागों में चलने का मौका मिला,
पर हमने सफ़र-ए-सेहरा चुन लिया।


खुशियों ने दरवाज़े पर दस्तक दी,
पर हमने अपना घर ही बदल लिया।


तो अब भला किस मुँह से कहें कि क़िस्मत साथ नहीं थी,
जब हमने ख़ुद ही अपनी क़िस्मत का फैसला कर लिया।

निदा अर्शी

3 टिप्‍पणियां:

  1. खुशियों ने दरवाज़े पर दस्तक दी,
    पर हमने अपना घर ही बदल लिया।
    vha kya baat hai.bhut accha.likhate rhe.

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  2. निदा अर्शी बहुत उम्दा लिखते हैं. और पढ़वाईयेगा.

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  3. और पढ़वाईये ना अर्शी साहेब को
    नीरज

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