शुक्रवार, 22 अगस्त 2008

क्यूँ वकीलों से भिड रहे हो जज साहब? इनकी ग़लती कहाँ है? ग़लती तो आपकी है, जो इन्हे ग़लती की सज़ा दे रहे हो!


बचपन में एक कहावत सुनी थी कि उल्टा चोर कोतवाल को डांटे। मगर यहाँ ये कहावत कुछ ऐसी लग रही है कि उल्टा वकील जज को डांटे। क्यूंकि कल ऐ यु खान और आर के आनंद पर जो दिल्ली हाई कोर्ट का फ़ैसला आया है उसके बाद ऐसा मालूम हुआ मनो किसीने इनकी दुम पर पैर रख दिया हो। बजाये इसके कि ख़ुद शर्मिंदा होते कि पिछले १५ महीनो में उन्होंने जिस केस को दबाकर रखा था उसपर कोर्ट ने फ़ैसला सुना दिया। जो फ़ैसला पहले बार कौंसिल को करना चाहिए था उसे कोर्ट को करना पड़ा। होना ये चाहिए था कि इस फैसले के बाद शर्मिंदा होते उन्होंने तो अदालत के अधिकार पर ही ऊँगली उठा दी। होना ये चाहिए था कि इन दोनों कानून के सौदागरों के ख़िलाफ़ और भी कड़ी सज़ा की माँगा करते उन्होंने इसके विरोध में ख़ुद खड़े होने का मन बना लिया। क्या बात है वकील बिरादरी! मुबारक हो आपको। ना जाने क्यूँ इसके बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि कहीं इन दोनों को बचाने की कोशिश इस लिए तो नही हो रही क्यूंकि ऐसा काफ़ी वकील करते हो। वो भी इसी प्रकार बचाव और सरकारी पक्ष मिलकर आरोपियों को बचाने का "धंधा " करते हो।
और मैं धन्यवाद देना चाहूँगा उन साथियों का जिन्होंने मेरे इस ख़याल के ये सज़ा जो इन लोगों को मिली है कम है में मेरा समर्थन किया है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. जब वकीलों को सजा की नौबत आ गयी है, तो आप समझ सकते हैं कि हालात कितने बदतर हैं।

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  2. जज साहब को ले-दे कर मामला खत्म कर देना था, जब नहीं माने तो आरोप झेलो...अभी तो वकिल आयेंगे बचाव में. सुना होगा चोर चोर मौसेरे भाई :)

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  3. संजय जी की बात से मैं बिलकुल सहमत हूं कि चोर चोर मौसेरे भाई होते । वकील वकील के खिलाफ कैसे हो सकता है भई।

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  4. सबसे बड़ा धंधा तो ये ही करते हैं कानून खरीदने और बेचने का धंधा। और वो भी हमेशा।

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  5. न्यायपालिका ने स्वयं ही अपने अधिकार को यह निर्णय दे कर कम कर दिया है। वास्तव में न्यायपालिका को इस तरह का निर्णय देने का अधिकार नहीं है। वह बार काउंसिल के समक्ष शिकायत को निर्णय के लिए प्रेषित कर सकती थी और काउँसिल के सही निर्णय नहीं करने पर उस पर अपील की सुनवाई की जा सकती थी।
    रोज उच्चन्यायालय अनेक अपीलों को रिमांड करता है क्यों कि उसे सजा सुनाने का अधिकार नहीं वह मजिस्ट्रेट या सेशन जज को ही है। सजा की उपयुक्तता या अनुपयुक्तता उच्च न्यायालय देख सकता है।
    यह देश का कानून है। अगर न्यायालय ही कानून से खेलने लगेंगे तो फिर कानून की परवाह करने वाले कितने रह जाएंगे?
    सजा सही हो सकती है लेकिन सजा वह नहीं दे सकता जिसे इसे देने का अधिकार नहीं है। फिर तो पुलिस ही फैसले करने लगेगी। और पुलिस ही क्यों पकड़े जाने पर पुलिस तक भी क्यों जाया जाए? क्यों नहीं मौके पर ही सब कुछ निपटा दिया जाए।
    यहाँ अपराधी वकीलों को बचाने का कोई इरादा नहीं है। लेकिन न्याय तो न्याय के तरीके से ही किया जाना चाहिए। वकीलों ने आरोपित कृत्य किया है तो उन्हें सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन कोई बारकाउँसिल का अधिकार छीनेगा तो बार काउँसिल तो बोलेगी।

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