शनिवार, 16 अगस्त 2008

ये मेरे यार की बातें हैं! कुछ मेरी डायरी से!

ये मेरे यार की बातें हैं!
ये मेरे यार की बातें हैं!
तसव्वुर में मेरी आज भी वो बसता है,
जिसके तसव्वुर में कभी हम शामिल थे साँसों की तरह।
है अब उन्ही का नाम, जो इन लबों से निकलता है,
जिनके लबों पे हम बसते से, क़ल्मों की तरह।

बोलने वाले ने कह दिया था काफ़िर उनको,
मगर वो मिलते थे हमसे इबादत की तरह,
न जाने क्यूँ नही आए मेरी मय्यत पर भी,
जो न रहते थे हमसे दूर किसी साए की तरह।
ये मेरे यार की बातें हैं!
ये मेरे यार की बातें हैं!

1 टिप्पणी:

  1. बोलने वाले ने कह दिया था काफ़िर उनको,
    मगर वो मिलते थे हमसे इबादत की तरह,
    न जाने क्यूँ नही आए मेरी मय्यत पर भी,
    जो न रहते थे हमसे दूर किसी साए की तरह।
    ये मेरे यार की बातें हैं!
    ये मेरे यार की बातें हैं!
    बहुत खुब, धन्यवाद

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