सोमवार, 25 अगस्त 2008

आज फिर आँख में नमी चली आई....

आज फिर आँख में नमी चली आई....
तन्हाई में यार की कमी चली आई....
भाग रहे थे जिन यादों से हम......
आज फिर से वो हमे घेरे चली आई.....

सोच पे कोई ज़ोर चले...
फिर दिल को हम रोक सके...
आज फिर उससे मिलने की तलब चली आई...
आज फिर आँख में नमी चली आई...
तन्हाई में यार की कमी चली आई....

ज़िंदा हुए है कुछ मरे से जज़्बात...
फिज़ाओं में फिर से वही खुशबू चली आई...
यादों के झरोकों से कुछ धुंधली तस्वीरें चली आई...
आज फिर आँख में नमी चली आई....
तन्हाई में यार की कमी चली आई...

आज फिर मुस्कुराहट की जगह ग़म ने ली...
अपनों के बीच भी मेरे हिस्से तन्हाई की आई...
दुनिया के शोर में भी खामोशी नज़र आई...
आज फिर आँख में नमी चली आई...
तन्हाई में यार की कमी चली आई....

4 टिप्‍पणियां:

  1. आज फिर मुस्कुराहट की जगह ग़म ने ली...
    अपनों के बीच भी मेरे हिस्से तन्हाई की आई...
    दुनिया के शोर में भी खामोशी नज़र आई...
    आज फिर आँख में नमी चली आई...
    तन्हाई में यार की कमी चली आई....

    अच्छा लिखा है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ज़िंदा हुए है कुछ मरे से जज़्बात...
    फिज़ाओं में फिर से वही खुशबू चली आई...
    यादों के झरोकों से कुछ धुंधली तस्वीरें चली आई...
    bahut badhiya...

    उत्तर देंहटाएं

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