रविवार, 3 अगस्त 2008

plz vacate the seats for physically challenged, senior citizen and ladies.........

कई दिनों से मैं की metro के interiors की शोभा बढाती एक नई हरी पट्टी को देख रही हूँ....जो कहती है केवल महिलाओ के लिए........इससे पहले भी अक्सर यह घोषणा सुनने को मिल जाती है की ..... plz vacate the seats for physically challenged, senior citizens and ladies.........काफी दिन यह देखने के बाद बात साफ़ हो गई की न तो लोगो पर उस घोषणा का कोई असर होता दिखता देता है और न ही इस नई हरी पट्टी का.....वैसे जहाँ आज की नारी समानता की गुहार लगा रही है वहां इस प्रकार का छोटा सा आरक्षण भी उसे कहीं न कहीं दिखा जाता है की वो जो मांग कर रही है वो उसका अधिकार नही.......और इस तरह का आरक्षण किस प्रकार किसी महिला की उन्नति या प्रगति में सहायता करता है यह बात भी मुझे तो समझ नही आती क्यूंकि आजतक महिलाओ को न तो संसद में कोई आरक्षण प्राप्त है और न ही सरकारी नौकरियो में तो यह आरक्षण क्यों??.....और जहाँ तक बात रही की छेड़ छाड़ से बचने की तो यह उपाए किसी तरह से कारगर होता मुझे तो नही दिखता....क्यूंकि आज भी मुझे उन सीट्स पे महिलाओ से ज़्यादा पुरूष ही बैठे दिखाई देते है.....पता नही या तो उन्हें हिन्दी या अंगेजी पढने में कठिनाई होती है या उनको ख़ुद के पुरूष होने पर शक है.......मैंने अक्सर देखा है की मदद मांगने वाले को मदद मिल ही जाती है सीट मांगने पर अक्सर लोग उठ जाते है.......पर यहाँ तक यह बात सच है वहीँ यह बात भी सच है की कुछ इतने महान सज्जन किसम के लोग होते है जो यह देखते हुए भी की कोई महिला चकरा रही है महिला -सीट का मोह नही त्याग सकते....फ़िर इस हालातो में मेट्रो में एक छाप मात्र लगा देने का क्या लाभ....जब तक लोग उसका अर्थ न समझे.....मैंने अक्सर देखा है की अगर कोई महिला बढ कर किसी पुरूष को सीट खाली करने को बोलती है तो हालाँकि उसे उठाना तो पढता है पर चहरे के हाव भाव से पता चल जाता है की जनाब को बात ज़रा भी पसंद नही आई.....और हाँ कुछ लोग उसे महिलाओ की दादागिरी का भी नाम दे देते है......तो जहाँ एक बड़ा ही गैर ज़रूरी सा आरक्षण महिलाओ को दे दिया जाता है वहीँ अगर वो उसे आगे बड़ के मांगे तो वो दादागिरी कहलती है.... यह कुछ पुरूषप्रधान समाज में रहने के कुछ नियम है शायद.......जिन्हें मानना ही पड़ता है....

2 टिप्‍पणियां:

  1. आरक्षण से किसी को फायदा नहीं होता। समानता अर्जित करनी पड़ती है, सिर्फ दिये जाने से काम नहीं चलता।

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  2. हा हा :) बिल्कुल सही वर्णन किया दिल्ली की मेट्रो का.........वैसे ये नज़ारा तो मई सालों से दिल्ली की बसों में देख रहा हूँ.......चौडे हो कर महिलाओं वाली सीट में बैठे होते है, किसी महिला के चढ़ने पर ऐसे प्रतिक्रिया करते है, जैसे की उसने कुछ देखा ही नही, और जब महिला हार कर उठने को कह ही देती है, तो ऐसे भारी मन से उठते है, जैसे की कंधे पर किसी ने सुमेरु पर्वत लाद दिया हो.........हा हा हा

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