शुक्रवार, 16 मई 2008

जयपुर धमाके: क्या ख़बर के नाम पर आतंकियों की मदद की गई?

जयपुर में धमाके हुए हम सभी देशवासियों को अफ़सोस हुआ और दिल दहल उठता। ऐसा कही भी और किसी के साथ हो सकता है। मगर जिस तरह से न्यूज़ चैनल्स ने ख़बर के साथ साथ पुलिस द्वारा की जा रही जांच की ख़बर दिखायी उससे मुझे ये महसूस हुआ कि इन चैनल्स ने कहीं न कहीं आतंकियों की मदद ही की है। जिस प्रकार सारे देश को पता था , उसी प्रकार आतंकियों को भी ये बात पता थी कि पुलिस कहाँ हाथ पाँव मार रही है। जिससे हो सकता है कि वो और भी सजग हो गए हों। खंबर के नाम पर ऐसा लगा कि कहीं न कहीं आतंकियों की मदद ही हो रही है।
अब सवाल ये उठता है कि क्या उन्हें ये ख़बर नही चलानी चाहिए थी? बिल्कुल चाहिए और यही उनका काम भी है मगर ज़रूरी नही कि वो भी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के साथ साथ अपनी जांच भी करें और उसे लगातार टीवी पर चलाया जाए? ये बात तो जग ज़ाहिर है कि मीडिया में ऐसे कईं लोग है जिनका दिमाग बहुत तेज़ चलता है और यदि उन्हें ऐसा कुछ दिखाई भी देता है जो जांच में मदद करता है तो उन्हें इसे जांच एजेंसियों के साथ बांटना चाहिए।ना कि टीवी पर चलाकर आतंकियों की मदद की जाए।
हो सकता है कि ये मेरा केवल भ्रम मात्र हो मगर क्या इससे आतंकियों को मदद नही मिलती ? मीडिया का कार्य ख़बर दिखाना है और अपने स्तर पर जांच भी करना हो सकता है मगर इस प्रकार अनजाने ही सही आतंकियों की मदद तो हो ही रही होती हैं।
मेरा केवल इतना मानना है कि यदि मीडिया को कुछ देखाई दे जो की जांच में मदद करे तो उसे पहले जांच एजेंसियों के साथ बांटे ना कि उसे पहले चैनल पर चला दिया जाए। टीवी इस समय दुनिया के कोने कोने में पहुँच रहा है और उसका असर सही भी होता है और ग़लत भी। तो लोगों को इस ग़लत असर से बचाना भी मीडिया का ही काम है।
और इसी प्रकार शायद इसी बहने पुलिस के कुछ अफसरों को भी अपने चाहेरा टीवी पर दिखाने का मौका मिल जाता है और वो जांच से जुड़े कईं तथ्य मीडिया के साथ बांटने लगते हैं। उन्हें भी चाहिए कि इस प्रकार कि संवेदनशील सूचनाएं मीडिया के साथ जांच पूरी होने से पहले न बांटे।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है. मैं इस से पूर्ण रूप से सहमत हूँ.

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  2. लोग सिर्फ अपना माल बेचने में लगे हैं। उन्हें देश, समाज,पुलिस, आतंकियों और किसी से कुछ लेना देना नहीं।

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  3. जनाब शायद आप भूल गए ये वही मीडिया है जिसके अतिउत्साही (परन्तु मूर्ख) रिपोर्टरों ने कारगिल युद्ध में tiger हिल पर धावे की तैयारिओं को पहले ही दिखा दिया था जिससे सेना को अपना समय और रणनीति में परिवर्तन करना पड़ा और इसमें अनेको जवानों की जान गयी. ये वही मीडिया है जो अक्षरधाम मंदिर पे हुए हमले के बाद NSG की तैयारिओं को लाइव दिखा रहा था और NSG ने उन्हें लात मार कर भगाया था. भारतीय मीडिया के लिए हर चीज़ बिकाऊ है चाहे वह देश की सुरक्षा और अस्मिता ही क्यों ना हो.

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