सोमवार, 20 अक्तूबर 2008

मौसम ए दर्द चल रहा है शायद! हाल ऐ दिल!

कुछ वक़्त का गुबार होगा, जिसने धोखे उठाये होंगे,

हम तो सेहरा में भी नहीं थे, फिर ये रेत आई कहाँ से॥


गुज़र रहे थे लम्हे यूँही तनहा अकेले,

उसमें ये उदासी की सिहरन आयी कहाँ से।


मौसम ए दर्द चल रहा है शायद,

हर कोई मिलता है तड़पता हुआ, गुज़रो जहाँ से।


उसने न लौटके आने का वादा किया था मुझसे,

गया था जब वो मेरे इस दिल के जहाँ से।


हज़ार ख़्वाब न सजाना कभी भी यारों,

एक ख़्वाब भी सच होता नहीं है, गर देखा हो दिल ए खाक़सार से।

8 टिप्‍पणियां:

  1. bhaav aache hain,shabdon ka chayan bhi aacha hai par kafiya samajh nahi aa raha, agar yeh ghazal hai to aap matle mein apne kafiya define kijiye, bina kafiye aur radeef ke aapki yeh rachna ghazal ke kanoon se kharij hai.

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  2. बहुत अच्छा लिखा है। बधाई स्वीकारें।

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  3. मौसम ए दर्द चल रहा है शायद,

    हर कोई मिलता है तड़पता हुआ, गुज़रो जहाँ से।

    sahi kaha.

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  4. अरे वाह क्या बात है । बेहतरीन लिखा है ।बधाई

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  5. गुज़र रहे थे लम्हे यूँही तनहा अकेले,
    उसमें ये उदासी की सिहरन आयी कहाँ से।

    -वाह! बहुत सुन्दर.बहुत उम्दा,बधाई.

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  6. हौसला बढ़ने के लिए सभी साथियों का धन्यवाद. और मनुज जी आपका खास तौर से धन्यवाद् मेरी गलती बताने के लिए. मेरी कोशिश होगी की धीरे धीरे ये गलतियाँ निकल जायें.

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