शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

निकलेगा जब चाँद तो, बुझ जाएगा दिल मेरा! हाल ऐ दिल!

तमन्ना सी है जगी हुई, आज फिर न जाने क्यूँ,
शायद फिर किसी एहसास ने, सर उठाया है,
ये निगाहें लगी हुई है, दरवाज़े पे क्यूँ,
शायद फिर किसके आने के अरमान ने, सर उठाया है।

ये वही दिन था, जब साथ साथ थे हम दोनों,
फिर इसी दिन ने, एक दिया अरमानो का जलाया है।

मैं सोच कर बैठा था के, न याद करूँगा तुझे,
फिर सुबह से, इन हिचकियों ने तड़पाया है।

है हैरान देखकर, ग़म भी ये हमारे,
क्या यही वो शख्स है, जिसको हमने रुलाया है?

निकलेगा जब चाँद तो, बुझ जाएगा दिल मेरा,
तू मेरे जितना क़रीब था, तुझे आज उतना ही दूर मैंने पाया है।

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