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Wednesday, December 23, 2009

आज वो शख्श भीड़ में भी तनहा नज़र आता है... हाल ऐ दिल!



उसकी ख्वाहिश थी कुछ तो अलग करने की,

इस तरह चलने की और भीड़ से अलग लगने की,

शायद कुछ और ही मंज़ूर ख़ुदा को रहा होगा,

आज वो शख्श भीड़ में भी तनहा नज़र आता है...

3 comments:

  1. बहुत अच्‍छी लगी आपकी रचना .. कुछ अलग सोंचने और करने वालों को खुदा भी साथ न दे तो वो क्‍या कर सकता है ??

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  2. भाई वाह क्या बात है , बहुत खूब , लाजवाब ।

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  3. बहुत खूब शुभकामनायें

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