
उसकी ख्वाहिश थी कुछ तो अलग करने की,
इस तरह चलने की और भीड़ से अलग लगने की,
शायद कुछ और ही मंज़ूर ख़ुदा को रहा होगा,
आज वो शख्श भीड़ में भी तनहा नज़र आता है...
कोतुहल मेरे दिमाग में उठता हुआ एक छोटा सा तूफ़ान है.जिसमें में अपने दिल में उठा रही बातों को लिख छोड़ता हूँ.और जैसा की नाम से पता चलता है कोतुहल.

बहुत अच्छी लगी आपकी रचना .. कुछ अलग सोंचने और करने वालों को खुदा भी साथ न दे तो वो क्या कर सकता है ??
ReplyDeleteभाई वाह क्या बात है , बहुत खूब , लाजवाब ।
ReplyDeleteबहुत खूब शुभकामनायें
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