शनिवार, 22 नवंबर 2008

ये मुहब्बत की बैचैनी है! हाल ए दिल!


गुज़ारिश मुहब्बत की, की नहीं जाती,
सोच समझकर, ये उल्फत की नहीं जाती,  
ये दिल की बात है, दिल से कहते हैं,
ज़बान से ये बयान, की नहीं जाती.

कभी उठकर के, बैठते हैं,
कभी बैठकर, फिर उठते हैं, 
ये मुहब्बत की बैचैनी है,
इसके लिए दवा कोई ली नहीं जाती.

यूँ जब याद आती है फिर नींद नहीं आती,
करते हैं शिक़ायत, खुदा से सब,
के "ए  खुदाया रात तो आती है,
पर ये कम्बख्त नींद नहीं आती".

सितमगर का सितम भी, न पूछिए ए हुज़ूर,
ऐसे नादाँ दोस्त का, न पूछिए ए हुज़ूर,
के जो तड़पा तो देता है,
मगर दिल को बहलाने की अदा, उसे नहीं आती.

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह, बहुत बढ़िया !
    घुघूती बासूती

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  2. के जो तड़पा तो देता है,
    मगर दिल को बहलाने की अदा, उसे नहीं आती.
    वाह जी ...क्या बात है...अच्छी रचना...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  3. nadeem bhai,aapko padhna hamesha se sukhad raha hai,sach puchiye aaj bhi achha laga par ek baat khatak gayi ki tukbandi ka khyal rakhte rakhte kaafi kuchh is rachna se kho gaya.plz aage se is baat ka khyal rakhein to ham pathakon ko adhik ras aayega.
    aur han sambhav ho to jab nayi rachna daalein kripya mujhe khabar jarur kar dein,
    ALOK SINGH "SAHIL"

    उत्तर देंहटाएं

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