मंगलवार, 18 नवंबर 2008

मुझे ख़तावार लिखिए! हाल ऐ दिल!


किसी को गुल ऐ आसमान लिखिए,
किसीको गुल ऐ बहार लिखिए,
पर जिसे तलब हो मुहब्बत की,
उसे दोस्तों, गुनहगार लिखिए।

गुज़ार देते हैं, सभी ज़िन्दगी यूँ तो अपनी,
कभी हँसते हुए, कभी रोते हुए,
पर जो इश्क की खातिर, आंसू बहाए,
उसकी ज़िन्दगी को भी, अश्क ऐ यार लिखिए।

मुहब्बत तो करता है, भँवरा भी, गुलों से यूँ तो,
जल जाता है, परवाना भी, शमा की चाहत में कहीं,
हूँ मैं भी गुनाहगार, इस खता का यारों,
सोचते क्या हैं? मुझे भी ख़तावार लिखिए।

3 टिप्‍पणियां:

  1. हूँ मैं भी गुनाहगार, इस खता का यारों,
    सोचते क्या हैं? मुझे भी ख़तावार लिखिए।

    bahut khoob.......!

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  2. गुज़ार देते हैं, सभी ज़िन्दगी यूँ तो अपनी,
    कभी हँसते हुए, कभी रोते हुए,
    पर जो इश्क की खातिर, आंसू बहाए,
    उसकी ज़िन्दगी को भी, अश्क ऐ यार लिखिए।

    waah kya baat hai sundar

    उत्तर देंहटाएं

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