गुरुवार, 6 नवंबर 2008

सितम! हाल ऐ दिल!

है तलाश किसकी, क्यूँ किसी को ढूँढता हूँ मैं,
जब पास नही है वो मेरे, क्यूँ उसे देखता हूँ मैं?


किताब ज़िन्दगी की फिर पढ़ लेंगे दोस्तों,
अभी तो मौत का फलसफा पढ़ रहा हूँ मैं।


गुलाम ज़िन्दगी फिर से होने लगी है ये,
ख़ुद इस ज़ंजीर को लपेटे बैठा हुआ हूँ मैं।


है सितम नज़र उनकी तो वो ही सही सही,
अब तो इस सितम के ही इंतज़ार मैं जी रहा हूँ मैं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. है तलाश किसकी, क्यूँ किसी को ढूँढता हूँ मैं,
    जब पास नही है वो मेरे, क्यूँ उसे देखता हूँ मैं?


    किताब ज़िन्दगी की फिर पढ़ लेंगे दोस्तों,
    अभी तो मौत का फलसफा पढ़ रहा हूँ मैं।

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है...

    उत्तर देंहटाएं
  2. है सितम नज़र उनकी तो वो ही सही सही,
    अब तो इस सितम के ही इंतज़ार मैं जी रहा हूँ मैं।

    बहुत अच्छे ....

    उत्तर देंहटाएं

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