शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

मैं अपने बचपन को फिर से ढूँढता हूँ। हाल ऐ दिल!

आज भी वक्त के इस पड़ाव पे बैठकर ज़रा सोचता हूँ,
मैं अपने बचपन को फिर से ढूँढता हूँ।
वो दिन भर दोस्तों के संग बैठना,
वो भोली भोली बातें करना,
वो नए नए सपने बुनना,
वो बैठ कर चाँद को ताकना देर तक,
वो भागना इधर उधर कहते हुए,
के देखो चाँद मेरा पीछा करे,
आज फिर उस चाँद को देखता हूँ,
और चरखा कातती अम्मा को ढूँढता हूँ।
मैं अपने बचपन को फिर से ढूँढता हूँ।

फिर बैठा हूँ उस गली में,
गुज़रा जहाँ बचपन अपना,
किया करते थे इंतज़ार हम सब दोस्त यार,
थे वो चीनी बाबू एक,
लाते थे जो हम सबके लिए चाट,
फिर घर के उस चबूतरे पर बैठकर,
मैं बचपन के उस दोस्त को ढूँढता हूँ।
मैं अपने बचपन को फिर से ढूँढता हूँ।

जाने हैं कितनी ही यादें,
मुश्किल है जिनको भूलना,
उम्र बेशक बढ़ रही है,
पर नाता जिनसे नही टूटता,
हाँ मैं उसी नाते को ढूँढता हूँ,
मैं अपने बचपन को फिर से ढूँढता हूँ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. waah bachpan ki sundar yaadein ahutkhub likhi hai,hame apna bachpan yaad aaya

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  2. bhai mera kiya ho gaya jawani lagta hai pasand nahi aye....jo bachpan yaad kar raha ho...

    by the way it realy very good...Actually heard touching....keepit up...

    उत्तर देंहटाएं

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