शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

कल तो ख़ुद को भी शक की नज़र से देखा हमने! हाल ऐ दिल!


मुझे ख़बर थी के रुसवा करके जाएगा मुझे,

न जाने क्यूँ ख़ुद को रुसवा होने का मौक़ा दिया हमने।



उसके अंदाज़ से लगता था कोई गैर है वो,

फिर भी उसको अपनों से ज़्यादा समझा हमने।



उठाये फिरते रहे तस्वीर उसकी हाथों में,

अपनों हाथों के छालों को न देखा हमने।



वो कहता रहा हमसे चला जाऊंगा तुझे छोड़कर,

फिर भी दिल में एक घर उसको दिया हमने।



के रात तन्हा गई और दिन भी तन्हा रहा,

एक उसको ख्याल को दिल से न जाने दिया हमने।



अब तो ख़ुद के साये के भी साये डर लगने लगा हमको,

कल तो ख़ुद को भी शक की नज़र से देखा हमने।

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