मंगलवार, 16 सितंबर 2008

करता है सब के सामने सौदा मेरे ईमान का! हाल ऐ दिल!

करता है सब के सामने सौदा मेरे ईमान का,
मैं करता हूँ मना उसको, तो कहता है तू है कौन?
वो है कोई हाकिम, कोई गुनाहगार है कभी,
मैं कहता हूँ उस से मान जा, कहता है तू है कौन?

जाता है कभी मार आता है किसीको,
लिखता है वहाँ नाम मेरा नामुराद वो,
सब कहते है मुझे, ये होगा शामिल कहीं उसमें,
मैं करता हूँ मना उनको, तो कहते हैं तू है कौन?

मैं करता हूँ जब अफ़सोस किसी की तबाही पर,
लोगों को नज़र आते हैं आंसू मेरे झूठे,
सब कहते हैं दिल ही दिल में खुश हो रहा है ये,
मैं करता हूँ मना उनको, तो कहते है तू है झूठ।

फिर सोचता हूँ, क्यूँ कर कहते हैं मुझे भाई ये लोग अपने?
क्यूँ जताते हैं मुहब्बत जब देखते हैं मुझे तड़पता?
क्या उनको नही दिखाई देता मैं साथ में उनके खड़े?
क्या उनको मेरा, ये दर्द सुनाई नही देता?
हैंरान होता हूँ जब दुद्कार दिया जाता हूँ अपनों के ज़रिये मैं,
क्या उनको मुझमे और कातिलों में कोई फर्क नही दिखता?

मेरा काम इशारा देने का था। जो मैं दे दिया। क्या करूँ शब्दों की कंगाली से जूझ रहा हूँ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. करता है सब के सामने सौदा मेरे ईमान का,
    मैं करता हूँ मना उसको, तो कहता है तू है कौन?
    वो है कोई हाकिम, कोई गुनाहगार है कभी,
    मैं कहता हूँ उस से मान जा, कहता है तू है कौन?

    bahut sunder bhaaw hain

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  2. इशारा सही किया-काहे की कंगाली, जनाब खजाने में: :)

    करता है सब के सामने सौदा मेरे ईमान का,
    मैं करता हूँ मना उसको, तो कहता है तू है कौन?
    वो है कोई हाकिम, कोई गुनाहगार है कभी,
    मैं कहता हूँ उस से मान जा, कहता है तू है कौन?

    उत्तर देंहटाएं

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