शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

मैं, मेरे सर और मेरी विद्यालय से भागने की कोशिश! शिक्षक दिवस पर कुछ मज़ेदार यादें!

शिक्षक दिवस पर वैसे तो कई यादें अपने आप मन में आ जाती हैं मगर अपने शिक्षकों के साथ की गई मस्ती का अपना ही आनंद होता था। आम तौर पर मैं अपने विद्यालय से भागना तो दूर छुट्टी करने की भी नही सोचता था। भला जितना मज़ा और मस्ती विद्यालय में होती थी वो घर पर रहकर कभी हो सकती है भला? पर अचानक एक दिन मुझे न जाने क्या हुआ के अचानक खाली बैठे बैठे मन हो गया की आज तो स्कूल से भागना है। क्यूँ भागना है और उसके बाद कहाँ जाना है इसके बारे में तो सोचा ही नही। अब मैं ठहरा कक्षा का मॉनिटर और वो भी भागने की सोचे तो क्या होगा? मगर जब ठान ली तो ठान ली। ऊपर से वो खाली period जो वैसे परेशान कर रहा था।

बस साथ देने के लिए रोज़ भागने वाले भी मिल गए वो सबसे पहले विद्यालय की दीवार फांद कर दूसरी और आ गए, हमारी कक्षा बिल्कुल दीवार के साथ थी तो बाहर जाकर वो खिड़की सामने के सामने खड़े हो गए, कुछ देर बाद मैं भी उन्ही के साथ मैं खड़ा था। अब बारी आई के किस प्रकार कक्षा से अपना बस्ता लिया जाए तो मैंने कक्षा मैं कहा कि भाई अब मेरा बस्ता भी दे दो। बाकी के साथी जो पहले ही भागने के इरादे से आते थे और उनके बसते मैं कॉपी और किताब न के बराबर ही होती थी तो उनका बस्ता तो खिड़की मैं लगी जाली से बाहर आ गया मगर मैं ठहरा तगड़ा पढ़ाकू (ऐसा लोग कहते थे :) इस ग़लत फ़हमी में मेरा हाथ नही है ) बस्ते में सारी की सारी किताबें और कापियां वो भला इन सरिये की जालियों से कहाँ से निकलती। इतने में शोर मच गया कि कक्षा अध्यापक आ गए हैं और सारे बच्चे अपनी अपनी जगह पर जाकर बैठ गए और मेरे पीछे खड़े अन्य साथी भाग खड़े हुए। मगर यहाँ भी हम तगडे निडर ( कोई चारा ही नही था, पता था सर ने आते ही पूछना है नदीम कहाँ है? अब मॉनिटर जो ठहरा :( ) अपनी जगह से हिले ही नही और सर से बात करने लगे। सर मुझे बाहर देखकर अपनी जगह परेशान उन्हें पीछे से प्रधान आचार्य जी के आने की आवाज़ आ रही थी जो पहले ही अन्य कक्षाओं में बच्चों को झाड़ते आ रहे थे। मुझे बाहर देखकर उनके हाथ पैर फूल गए बोले "अबे गपूचे( जिसका मतलब मुझे आजतक नही पता चला) तू बाहर क्या कर रहा है?" मैंने भी तपाक से जवाब दिया "सर में भाग रहा हूँ कक्षा से" ये सुनकर उनकी आँखें पता नही क्यूँ खुली कि खुली रह गई और हंसने लगे बोले " अबे अब तू क्यूँ भाग रहा है?" हमने कहा " सर आज मन कर रहा है तो भाग कर ही रहूँगा"। ये सुनकर वो बोले "अबे जाना है तो चला जा प्रिंसिपल आ रहे हैं यहाँ मत खड़ा हो।" जिसपर मैंने कहा "सर मेरा बस्ता तो अन्दर है वो तो पकड़ा दो." वो बोले "बेटा शर्म तो नही आ रही अपने ही अध्यापक से भागने के लिए बस्ता मांग रहा है।" ये सुनकर मैं और मेरे साथ पूरी कक्षा हंसने लगी। इतनी में किस ने कहा के प्रिंसिपल साथ वाली कक्षा में है तो सर जल्दी से मेरा बस्ता लेकर खिड़की पर आ गए और उसे बाहर निकालने की कोशिश करने लगे। मगर वो बस्ता भी तो हमारा था कैसे निकल जाता। कुछ देर कोशिश करने के बाद सर झल्लाकर बोले "अबे period के हिसाब से बस्ता क्यूँ नही लाता सारी की सारी किताबें भर राखी है। अब न तो तू ही भाग पायेगा और तेरे चक्कर में मेरी भी नौकरी गई ही समझो आज तो प्रिंसिपल मुझे देख लेगा कि मैं किस प्रकार बच्चों को भगा रहा हूँ।" मैंने कहा कि "सर कुछ जुगत लगाओ" तो उन्होंने बस्ते की कुछ किताबे निकालकर दूसरों के बस्ते में रखवानी शुरू कर दी और बस्ता कुछ हल्का किया जिससे वो खिड़की से निकल जाए। मगर हम भी एक नंबर के मूडी फिर दिमाग पलट गया कि अब नही भागना मुझे तो कक्षा में ही रहना है। अब सर कहें बेटा बस्ता पकड़ और मैं कहूं के मुझे अन्दर आना है। यहाँ मामला फिर उल्टा हो गया जहाँ अध्यापक छात्र को भगा रहे थे और छात्र था कि भागने का नाम ही न ले । :)

अब सर बोले के " अब तू अन्दर कैसे आएगा प्रिसिपल बाहर खड़ा है और तू कहाँ से आयेगा? " हमने भी तपाक से कहा कि सर गया तो दीवार कूदकर था मगर अब आऊंगा main गेट से। ये सुनकर सर के दिल कि धड़कने और बढ़ गई उन्होंने भी सोचा होगा आज तो ये गया और मुझे भी साथ ले कर जायेगा । अब यहाँ भी confidence (काहे का confidence मजबूरी थी ) हम भी main गेट की तरफ चल दिए वहाँ से अन्दर गए तो देखा अपनी क्ष के पास ही प्रधान अध्यापक जी खड़े हुए थे पता नहीं उनके मन में क्या था मुझे से पूछा : कहाँ से आ रहे हो? " और मैंने भी कहा "सर ज़रा बहार गया था। " अब पता नहीं उनको ये बात सही सुनाई दी या नहीं या उन्होंने कुछ और ही समझा. उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा और मैं अपनी क्ष में चला gaya जहाँ मेरे कक्षा अध्यापक खड़े hue थे. मुझे देखते ही उन्होंने मुझे पकड़ लिया बोले " अबे गपूछे क्या कर रहा था बाहर और और आज तो तूने मुझे भी नौकरी से निकलवा ही दिया होता. " ये कहकर वो और साथ में सारी कक्षा हंसने लगी और उस दिन बस एक गीत सुनाकर मेरा पीछा उनसे छूट गया. मगर उस दिन के बाद फिर न तो मेरा इरादा कभी कक्षा से भागने का हुआ और न ही कभी किसी रोज़ के भागने वाले ने मुझे अपने साथ ले जाने के बारे में विचार किया. उन्होंने भी सोचा होगा ये न तो ख़ुद भागेगा और न ही हमें भागने देगा बल्कि पकड़वा ज़रूर देगा.

अब इससे कोई ये न समझे के हमारे सर अक्सर छात्रों को भगाया करते थे. वो तो वो उड़ सिन फँस गए थे जिसकी वजह से उन्हें मेरी मदद करनी पड़ी. या शायद वो मुझे बचाना छह रहे थे. जय हो गुरूजी की !!!

2 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो है किस्‍सा
    सुख के दुख में
    और दुख के सुख में
    बदलने और
    हंसने हंसाने
    मास्‍टर को फंसाने
    का रिक्‍शा।

    http://www.hindimedia.in/content/view/3349/43/

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  2. मजेदार संस्मरण!!

    शिक्षक दिवस के अवसर पर समस्त गुरुजनों का हार्दिक अभिनन्दन एवं नमन.

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