आज फिर कुछ सालों के बाद,
फिर वहीँ खड़ा हूँ उसी दोराहे पर,
फिर सोच रहा हूँ कहाँ जाऊँ,
आज खड़ा इस दोराहे पर,
हो रहा है जो भी कुछ,
इसको ऐसे तो नही होना था!
हूँ बेचारा आज फिर,
हूँ लाचार सा,
देखता हूँ सबको आते जाते,
मगर ख़ुद हूँ बीमार सा,
जाने इंतज़ार है मुझे किस बात का,
हो रहा है जो भी कुछ,
इसको ऐसे तो नही होना था!
डरने लगा हूँ आज मैं एक हवा के झोंके से भी,
करने लगा हूँ बातें ख़ुद से ही क्यूँ?
दिमाग तो रखता हूँ मैं भी "या रब",
पर इसमे कुछ आता नही है क्यूँ?
हो रहा है जो भी कुछ,
इसको ऐसे तो नही होना था!
Friday, September 18, 2009
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