रविवार, 28 सितंबर 2014

तनहा खड़ा हूँ खुद के घर में

Feeling Alone
तनहा खड़ा हूँ खुद के घर में / इमेज; hqwallbase.com
न जाने कितनी बार लौटने का वादा करके फिर न लौटा मैं,
आज जब लौटा हूँ तो तनहा खड़ा हूँ खुद के घर में,
यूँ तो अक्सर मुझे आदत थी वादा करके ना आने की,
आज आया हूँ तो पता चला के बहुत से लोग चले गए इस घर से,

सोमवार, 25 जून 2012

Tamasha hai Zindagi aur main ek bandar: तमाशा है ज़िन्दगी,


तमाशा है ज़िन्दगी,
और उस तमाशे का,
मैं कोई बन्दर सा हूँ,
लोग आते हैं,
 चंद सिक्के उछलकर चले जाते हैं,
और मैं उन सिक्कों को,
समेटता रह जाता हूँ।


गुज़र जाती हैं,
मेरी ज़िन्दगी की, कुछ घड़ियाँ,
यूँही उछलते  कूदते,
मगर जब शाम होती है,
खुद को तनहा,
किसी रस्सी से बंधा पाता  हूँ,
मैं सिक्को को  समेटता रह जाता हूँ।


 कल जब मैं मिला था अपने आप से,
 उस अँधेरे कोने में,
जहाँ रहती थी तनहाई,
रहती ग़मों को पिरोने में,
पाया खुद को किसी धागे में बंधा,
उलझा हुआ सवालों में,
न जाने क्यूँ खुद को अब तक,
उन बंदिशों से आज़ाद करा न पाता हूँ,
मैं सिक्को को समेटता रह जाता हूँ।

शुक्रवार, 8 जून 2012

ज़िन्दगी को एक बोझ की तरह, जी कर ही रवानगी ले लूँगा.


शाम ज़रा मुख़्तसर सी होकर,
सिकुड़कर बैठी है,
और मैं सोच रहा हूँ,
शायद कुछ ज़िन्दगी के बारे में,
पता नहीं मिलेगी भी मुझे,
या फिर यूँही तन्हा,
कुछ हसरतों को लिए,
ज़िन्दगी को एक बोझ की तरह,
जी कर ही रवानगी ले लूँगा.

लोग कहते हैं,
तू मायूसी मिटा देता है,
जहाँ भी जाता है.
मैं हँस देता हूँ,
ये सोचकर,
के मेरे दिल की मायूसी भी,
क्या कभी मिट पायेगी,
या फिर यूँही तन्हा,
कुछ हसरतों को लिए,
ज़िन्दगी को एक बोझ की तरह,
जी कर ही रवानगी ले लूँगा.

रविवार, 15 जनवरी 2012

क्रिकेट: क्या केवल कुछ matches हारें से १०० से, अधिक टेस्ट खेलने वालों की योग्यता कम हो गयी है?



भारत की क्रिकेट टीम अपना तीसरा टेस्ट मैच भी ऑस्ट्रेलिया के हाथों बुरी तरह हार गयी। सभी नाराज़ हैं और मैं भी हूँ। सभी गुस्से में ना जाने क्या क्या बोल रहे हैं। कोई कहता है अब सचिन को खेलना छोड़ देना चाहिए और कोई राहुल द्रविड़ के पीछे पड़ा है, किसीको अब लक्ष्मण पसंद नहीं आ रहा तो कोई सहवाग के पीछे पड़ा है। सभी चाहते हैं के इन बड़े खिलाडियों को अब खेल से सन्यास ले लेना चाहिए। गोरतलब ये है की अभी कुछ दिन पहले तक हम सब इन्ही लोगों के गुणगान करते थे और हमें इनमे इतनी कमियां निकाल रहे हैं।
मेरा सवाल ये है की क्या कुछ matches हारने से इन खिल्दियों जिन्होंने १०० से अधिक टेस्ट matches खेलें हैं, इनकी योगता कम हो गयी है?

pic from yahoo cricket।

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

हाल ऐ दिल: खंडहर शिक़वा नहीं करते.


लौटा है कोई बड़ी मुद्दत के बाद यहाँ,
दिल में कईं अरमान, कईं डर हैं उसके,
!
!
!
भूल गया, खंडहर शिक़वा नहीं करते.

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

त्रिवेणी: क़ाश हम दोनों ने ये क़दम उठाया ही ना होता



कुछ पशोपेश में, वो भी हैं-हम भी हैं,
कुछ सज़ा का डर उनको भी है-हमको भी,
!
!
!
क़ाश हम दोनों ने ये क़दम उठाया ही ना होता...

Pic from om-rayan.deviantart.com

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

हाल ऐ दिल: ग़र वो बेवफा ना होता!



ख़याल उसका ना कभी आया होता,
यूँ ना दर्द को हमने कभी पाया होता,
वो भी रहता कभी हमारे दिल के करीब भी,
ग़र दिल बेवफा से ना लगाया होता

रविवार, 14 अगस्त 2011

अलविदा शम्मी कपूर साहब!!!

बचपन गुज़रा, शम्मी जी को देखते हुए, उनकी फिल्में, उनका पान पराग वाला विज्ञापन, उनके गले में पड़ी रहने वाली वो माला.... बहुत कुछ तो देखते हुए बड़े हुए, जो शायद कभी भुलाया नहीं जा सकता...उनका व्यक्तित्व, जो की शायद आजकल किसी को भी मुश्किल से मिलेगा...वो हर मुश्किल सवाल को सहजता से लेना... वो सवाल करने वाले के संकोच को मिटाते हुए, ख़ुद उस सवाल को पूरा करना.... अपनी बात को आसान शब्दों में समझाना...भारत के शायद सबसे पहले लोगों में से एक जिन्होंने इन्टरनेट प्रयोग करना शुरू किया... बहुत उनके बारे में जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं...आप जहाँ भी रहे, ख़ुदा आपकी रूह को आराम पहुंचाए...अलविदा शम्मी साहब...

रविवार, 17 अप्रैल 2011

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

बुधवार, 29 सितंबर 2010

रविवार, 26 सितंबर 2010

रविवार, 18 जुलाई 2010

उनको तो राज़ छुपाना भी नहीं आता! त्रिवेणी की कोशिश!


ख़ुद-ब-ख़ुद बोल जाती हैं आँखें उनकी,
जो वो नहीं कहते, कह जाती हैं आँखें उनकी,
!
!
!


उनको तो राज़ छुपाना भी नहीं आता.....

मंगलवार, 1 जून 2010

गुरुवार, 27 मई 2010

सोमवार, 24 मई 2010

बस स्टॉप और तेरी यादों से रिश्ता! हाल ऐ दिल!


कल कोई ज़िक्र वफ़ा का कर रहा था कहीं...और मैं फिर आदतन तुम्हे याद कर बैठा........ क्या करूँ पागलपन गया जो नहीं है अभी........फिर उस शख्स की बातें ध्यान से सुनने लगा और ..........और..........और फिर सोचा अब भी लोग वफ़ा पे यकीन करते हैं?........यूँही शिक़वे शिक़ायत करते आगे बढ़ा...........तो ख़ुद को उसी बस स्टॉप पर पाया, जहाँ अक्सर मैं तुम्हारा इंतज़ार किया करता था.............कुछ देर वहां रुका और अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गया.........चलते चलते यूँही एक पुराना तराना दिमाग में आया .........फिर वही यादों का दौर एक बार फिर, शुरू जो हुआ दिन ढलने के बाद तक जारी रहा....

सर--शाम तेरी याद......
और
नम आँखें...
तेरी
यादों से कुछ रिश्ता बाक़ी है अभी......

रविवार, 16 मई 2010

अगर ये फासला ना होता, तो क्या ये मज़ा होता ? त्रिवेणी की कोशिश!


याद जब भी आती है, तो आँखें नाम हो ही जाती हैं,
तेरी बातों की यादों में, ये ग़ोते लगाती हैं ,
!
!
!
अगर ये फासला ना होता, तो क्या ये मज़ा होता ?

गुरुवार, 13 मई 2010

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