शाम ज़रा मुख़्तसर सी होकर,
सिकुड़कर बैठी है,
और मैं सोच रहा हूँ,
शायद कुछ ज़िन्दगी के बारे में,
पता नहीं मिलेगी भी मुझे,
या फिर यूँही तन्हा,
कुछ हसरतों को लिए,
ज़िन्दगी को एक बोझ की तरह,
जी कर ही रवानगी ले लूँगा.
लोग कहते हैं,
तू मायूसी मिटा देता है,
जहाँ भी जाता है.
मैं हँस देता हूँ,
ये सोचकर,
के मेरे दिल की मायूसी भी,
क्या कभी मिट पायेगी,
या फिर यूँही तन्हा,
कुछ हसरतों को लिए,
ज़िन्दगी को एक बोझ की तरह,
जी कर ही रवानगी ले लूँगा.


