रविवार, 30 नवंबर 2008

अगर संभाला नही जा रहा है तो क्यूँ न पाकिस्तान अपनी मुसीबत भारत को गोद देदे.

अधिकतर आतंकी हमले के बाद हम सब पाकिस्तान की ओर ऊँगली करके खड़े हो जाते हैं ओर पाकिस्तान एक टका सा जवाब पकड़ा देता है के वो ख़ुद भी इस आतंकवाद से पीड़ित है। जबकि हमें ज्ञात है के ये सारा आतंकवाद उसी की छत्र छाया में पला है जो आज उसे भी आँख दिखा रहा है। यदि पाकिस्तान अपने इस पालतू को सँभालने लायक नही है तो क्यूँ नही वो ये मुसीबत भारत को गोद देता ओर क्यूँ नही भारत सरकार इस मुसीबत को गोद लेने की पेशकश करती। मतलब ये है के अगर पाकिस्तान से इसका खातमा नही हो रहा है तो भारत को इसके शिकार की दावत देदे।
अगर भारत को इस मुसीबत को खत्म करने का मौका दे दिया जाता है तो मैं समझता हूँ के हमारी सेना ओर जवान इस लायक हैं के उनके घर में यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अफ़गान सीमा दोनों पर जाकर उनके ठिकानो को तबाह ओ बर्बाद कर सकते हैं।

क्यूँ न हो के सरकार चाहे वो किसी भी दल की क्यूँ न हो पाकिस्तान पर दबाव बनाकर इस बात की इजाज़त ले के उसे इन आतंकी ठिकानों पर हमले का मौका दिया जाए।

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

मैंने हिन्दुस्तान को जलते देखा है! हाल ऐ वतन!

दहशत की आग में,

मैंने हिंदुस्तान को जलते देखा है,

हर एक वार से इसको लड़ते देखा है,

मरहम लगाने को कोई नहीं,

हाँ सियासी रोटियां सेकते देखा है,

चंद महीने में ही इसके ज़ख्मो को,

फिर हरा होते देखा है,

इंसानों को लाशो में तब्दील, होते देखा है,

नफरत की आग में लाखों घरो को, जलते देखा है,

जली हुई राख से,

हिन्दुस्तान के चमन को, फिर खिलते देखा है,

हर काली रात के बाद,

एक नई सुबह को, होते देखा है,

मैंने हिन्दुस्तान को जलते देखा है.....

मैंने हिन्दुस्तान को जलते देखा है.....

निदा अर्शी....

शनिवार, 22 नवंबर 2008

ये मुहब्बत की बैचैनी है! हाल ए दिल!


गुज़ारिश मुहब्बत की, की नहीं जाती,
सोच समझकर, ये उल्फत की नहीं जाती,  
ये दिल की बात है, दिल से कहते हैं,
ज़बान से ये बयान, की नहीं जाती.

कभी उठकर के, बैठते हैं,
कभी बैठकर, फिर उठते हैं, 
ये मुहब्बत की बैचैनी है,
इसके लिए दवा कोई ली नहीं जाती.

यूँ जब याद आती है फिर नींद नहीं आती,
करते हैं शिक़ायत, खुदा से सब,
के "ए  खुदाया रात तो आती है,
पर ये कम्बख्त नींद नहीं आती".

सितमगर का सितम भी, न पूछिए ए हुज़ूर,
ऐसे नादाँ दोस्त का, न पूछिए ए हुज़ूर,
के जो तड़पा तो देता है,
मगर दिल को बहलाने की अदा, उसे नहीं आती.

शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

ये जो दिल से जंग है, वो लड़नी नही आती! हाल ऐ दिल!


ख़बर रखते तो थे हम ज़माने भर की ऐ दोस्त,
अब आलम ये है के, ख़ुद ही ख़बर ली नही जाती।


वो कहते हैं के, ख़्वाब सजाया करो निगाहों में,
इन निगाहों का क्या करें, जिनमे, उनके सिवा कोई, तस्वीर नही आती।

सितम करना सुना था, एक अदा है हुस्न की,
सवाल ये है, क्या इसके सिवा, कोई अदा उसे नही आती?

ख़याल आया जो कभी उनका, तो हाथ दिल पे रख लिया,
इस दिल से अब उनकी याद भी, सही नही जाती।

दुश्मनों से दुश्मनी निभाना, तो खूब सीखा है हमने भी,
मगर ये जो दिल से जंग है, वो लड़नी नही आती।

गुरुवार, 20 नवंबर 2008

बड़ी नाज़ुक है ये मंजिल मुहब्बत का सफर है.

कुछ समझ नही आ रहा था के क्या लिखूं, तो जगजीत सिंह जी की गई एक ग़ज़ल कानो में गूंजने लगी।
तो सोचा क्यूँ न आज दिल के हालात जगजीत सिंह जी की आवाज़ में आपको सुना दूँ।


बुधवार, 19 नवंबर 2008

होती है जलन, परवाने की शहादत पे मुझे! हाल ऐ दिल!


देखकर परवाने का, दीवानापन, कुछ शमा भी, इतराई तो होगी,
हल्की ही सही, उसकी आग में, गुलाबी सी मुस्कुराहट, आई तो होगी।

सोचा तो होगा, उसने भी, परवाने के जल जाने पर,
उसकी आँख भी, परवाने के अंजाम पर, भर आई तो होगी।

क्या है ज़िन्दगी भी, परवाने की, शमा की नज़रों में,
ये बात, किसी शायर ने, कलम से, उठाई तो होगी।

है अंजाम क्यूँ, मुहब्बत का, चाहत में जल जाना यारों,
इस सवाल पे, किसी दीवाने ने, अदालत लगायी तो होगी।

होती है जलन, परवाने की शहादत पे मुझे, ना जाने क्यूँ?
इस परवाने ने, लोगों के दिलों में जगह, बनाई तो होगी।

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

मुझे ख़तावार लिखिए! हाल ऐ दिल!


किसी को गुल ऐ आसमान लिखिए,
किसीको गुल ऐ बहार लिखिए,
पर जिसे तलब हो मुहब्बत की,
उसे दोस्तों, गुनहगार लिखिए।

गुज़ार देते हैं, सभी ज़िन्दगी यूँ तो अपनी,
कभी हँसते हुए, कभी रोते हुए,
पर जो इश्क की खातिर, आंसू बहाए,
उसकी ज़िन्दगी को भी, अश्क ऐ यार लिखिए।

मुहब्बत तो करता है, भँवरा भी, गुलों से यूँ तो,
जल जाता है, परवाना भी, शमा की चाहत में कहीं,
हूँ मैं भी गुनाहगार, इस खता का यारों,
सोचते क्या हैं? मुझे भी ख़तावार लिखिए।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

मैं अपने बचपन को फिर से ढूँढता हूँ। हाल ऐ दिल!

आज भी वक्त के इस पड़ाव पे बैठकर ज़रा सोचता हूँ,
मैं अपने बचपन को फिर से ढूँढता हूँ।
वो दिन भर दोस्तों के संग बैठना,
वो भोली भोली बातें करना,
वो नए नए सपने बुनना,
वो बैठ कर चाँद को ताकना देर तक,
वो भागना इधर उधर कहते हुए,
के देखो चाँद मेरा पीछा करे,
आज फिर उस चाँद को देखता हूँ,
और चरखा कातती अम्मा को ढूँढता हूँ।
मैं अपने बचपन को फिर से ढूँढता हूँ।

फिर बैठा हूँ उस गली में,
गुज़रा जहाँ बचपन अपना,
किया करते थे इंतज़ार हम सब दोस्त यार,
थे वो चीनी बाबू एक,
लाते थे जो हम सबके लिए चाट,
फिर घर के उस चबूतरे पर बैठकर,
मैं बचपन के उस दोस्त को ढूँढता हूँ।
मैं अपने बचपन को फिर से ढूँढता हूँ।

जाने हैं कितनी ही यादें,
मुश्किल है जिनको भूलना,
उम्र बेशक बढ़ रही है,
पर नाता जिनसे नही टूटता,
हाँ मैं उसी नाते को ढूँढता हूँ,
मैं अपने बचपन को फिर से ढूँढता हूँ।

गुरुवार, 6 नवंबर 2008

सितम! हाल ऐ दिल!

है तलाश किसकी, क्यूँ किसी को ढूँढता हूँ मैं,
जब पास नही है वो मेरे, क्यूँ उसे देखता हूँ मैं?


किताब ज़िन्दगी की फिर पढ़ लेंगे दोस्तों,
अभी तो मौत का फलसफा पढ़ रहा हूँ मैं।


गुलाम ज़िन्दगी फिर से होने लगी है ये,
ख़ुद इस ज़ंजीर को लपेटे बैठा हुआ हूँ मैं।


है सितम नज़र उनकी तो वो ही सही सही,
अब तो इस सितम के ही इंतज़ार मैं जी रहा हूँ मैं।

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